पतंग सा ज्वाला के इर्द गिर्द क्यों अपने को भस्म करुँ ।
नहीं किसी के हाथों से झटके खा खाकर उडा करुँ ॥
बस चकोर सा व्रत लेकर उडूँ चाँद का चुम्बन कर लूँ । लोटूँ तो कंचन शिखरों पर चन्द्र किरण मैं बिखरा दूँ ॥
फिर वासंतिक वसुंधरा में अनायास घुलमिल जाऊँ । बिंब चाँद का पोखर में मनहर निहार विश्राम करूँ ॥
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